मेजर सोमनाथ शर्मा, PVC

मेजर सोमनाथ शर्मा, PVC

“दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर हैI हमारी गिनती बहुत कम रह गयी हैI हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूँगा और आख़िरी गोली और आख़िरी सैनिक तक डटा रहूँगाI”- मेजर सोमनाथ शर्मा का मुख्यालय को दिया गया अंतिम सन्देशI

 

यह अंतिम शब्द थे 24 वर्ष के उस नौजवान के जो अपनी बहादुरी से भारत के पहले सर्वोच्च शौर्य सैन्य सम्मान, परमवीर चक्र के हक़दार बनेI इन शब्दों ने हर भारतीय की हिम्मत को दोगुना कर दिया, इन शब्दों ने सेना पर हमारे भरोसे को और मजबूत बना दियाI इन शब्दों ने हमें भारतीय होने पर गर्व से सराबोर कर दियाI इन्हीं शब्दों से एक वीर ने अपने साहस और दृढ़ निश्चय से भारत के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कियाI

 

एक शर्मीला नौजवान, जिसे उनके माता पिता व दोस्त प्यार से ‘सोमी’ बुलाते थे, पूरे देश को गौरवान्वित कर जायेगा… किसे पता था! सोमी का एक शर्मीले लड़के से एक कर्मठ सैनिक बनने का सफ़र, जो देश की इज़्ज़त पर न्योछावर हो गया, हमें गर्व से भर देता हैI

 

सोमी से मेजर सोमनाथ शर्मा

सोमी का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से कस्बे डाढ़, पालमपुर  में हुआ थाI उनके पिता श्री अमर नाथ शर्मा, भारतीय सेना में मेजर जनरल के पद पर थे, जो कि बाद में भारतीय सैन्य चिकित्सा कोर के पहले प्रबंध निदेशक (Director General) बनेI बचपन में सोमी अपने नाना पंडित दौलत राम के बहुत करीब थेI नाना जी सोमी को भगवत गीता सुनाया करते थेI श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश सोमी के बुद्धिमान दिमाग से परे नहीं थे, वे बालपन में ही गीता का सार समझ चुके थेI

 

सोमी अपने चाचा कैप्टेन के. डी. वासुदेव से बहुत प्रभावित थे, जो कि विश्व युद्ध II मलायन कैंपेन में जापानियों से ‘स्लिम नदी’ पर बने एक पुल की रक्षा करते हुए शहीद हो गएI अपने पिता व चाचा को अपनी प्रेरणा मानते हुए, सोमी ने बचपन में ही सेना में जाने का निर्णय कर लिया थाI उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल के शेरवूड कॉलेज से प्राप्त कीI फिर उन्होंने देहरादून के ‘ Prince of Wales Military College’ में नामांकन करवाया परन्तु दाख़िला सैंड्हर्स्ट स्थित ‘Royal Military College’ में लियाI 22 फरवरी, 1942 के दिन भारतीय सेना के आठ वीं बटालियन, उन्नीस वीं हैदराबाद रेजिमेंट (बाद में 4th बटालियन, कुमाओं रेजिमेंट) ने मेजर सोमनाथ शर्मा को एक सैन्य अधिकारी के रूप में पायाI

 

अपने सैन्य जीवन के प्रारंभ में भी उनका साहस अदृश्य नहीं थाI बर्मा में अरकान युद्ध के दौरान कर्नल के. स. थिम्मया के अधीन उन्हें “mention-in-despatches” का ख़िताब मिलाI यह कहानी बहुत रोचक है, युद्ध के दौरान उनके सहायक बहादुर को बहुत गहरी चोटें आई थीं, जिनकी वजह से वे चल कर बेस तक जाने की स्थिति में नहीं थेI मेजर शर्मा ने बहादुर को अपने कंधे पर उठाया और चलने लगेI जब कर्नल थिम्मया ने देखा की शर्मा पीछे रह गए हैं, तो उन्होंने शर्मा को आदेश देते हुए कहा, “इस आदमी को छोड़ो सोम, और कैंप की तरफ भागोI” मेजर शर्मा ने जवाब में कहा, “सर, यह जिसे मैंने उठा रखा है मेरा सहायक है, इसे बहुत चोट लगी है व खून भी बह रहा है, मैं इसे नहीं छोड़ुंगा” इस तरह मेजर शर्मा ने करोड़ों भारतीयों के साथ ही अपने सहायक की भी जान बचाईI उन्होंने साबित कर दिया कि वे बिना अपनी जान की परवाह किये हर हिन्दुस्तानी की रक्षा के लिए खड़े थेI

 

आक्रोश का अंजाम

भारत के विभाजन ने सरहद के दोनों पार कभी न भरने वाले घाव दे दिएI जहाँ एक और अंग्रेजी हुक़ूमत से आज़ादी की ख़ुशी थी वहीं दूसरी और अपनों से बिछड़ने का दुःख थाI करीब 550 रियासतों को ये फैसला करना था कि वे किस देश के साथ जुड़ना चाहती हैंI लगभग हर रियासत ने भौगोलिक दृष्टि से क़रीबी राष्ट्र को चुना, मगर कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने आज़ादी चुनीI एक तरफ भारत ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई वहीं दूसरी तरफ अपने भौगोलिक क्षेत्र से नाखुश पाकिस्तान ने आज़ाद कश्मीर पर हमला कर उसे कब्ज़े में लेने की योजना बनाईI इसी के तहत पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 के दिन घाटी में दहशत फ़ैलाने के इरादे से लश्कर भेजेI तब महाराजा हरी सिंह ने तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु से मदद मांगी व भारत में सम्मिलित होने की इच्छा ज़ाहिर कीI

 

31 अक्टूबर 1947 को भारत सरकार ने अपनी सेना को कश्मीर में स्थिति संभालने के लिए भेजाI मेजर सोमनाथ शर्मा को कश्मीर ना जाने का आदेश मिला क्योंकि हॉकी खेलते हुए चोट लगने के कारण उनका बायाँ हाथ टूटा हुआ थाI मगर उस वीर ने एक अदने से प्लास्टर को मात्र भूमि की रक्षा के सौभाग्य के आड़े नहीं आने दियाI बहुत ज़िद करने के बाद उन्हें जाने की अनुमति मिली, वे घाटी को भेजी गयी तीन में से दो टुकडियों के संचालक थेI

 

सोमी की ‘शौर्यगाथा’

3 नवंबर 1947, मेजर सोमनाथ शर्मा ने बडगाम में एक थकाऊ दिन के बाद शांत रात की उम्मीद करते हुए ऊपर की ओर देखा, उनकी चमकती हुई आँखों ने सूर्य को धीरे-धीरे पश्चिम की और जाते हुए देख रही थी, अंधेरा होने में अभी वक़्त थाI यह सुनिश्चित करने के लिए कि कश्मीर पूरी तरह से सुरक्षित है, मेजर शर्मा ने देर शाम तक बडगाम में ही रुकने का फैसला कियाI सूरज छिपने में कुछ ज़्यादा ही वक़्त लगा रहा थाI लग रहा था जैसे आज वह भी मेजर शर्मा और उनकी टुकड़ी के साथ हैI बंकर पर टूटे हुए हाथ का सहारा लिए खड़े मेजर शर्मा के उत्साह के आगे झेलम भी नतमस्तक थीI उनके चेहरे पर कोई चिंता की लकीर नहीं थी, उनका शांत चेहरा किसी भी स्थिति का डट कर सामना करने की उनकी काबिलियत की गवाही दे रहा थाI

 

यह दिन 4 कुमाँऊ रेजिमेंट की अल्फा व डेल्टा कम्पनी (मेजर शर्मा के अधीन) व 1 पैरा की एक कम्पनी (कैप्टेन रोनाल्ड वुड के अधीन) के लिए काफी व्यस्त थाI उन्हें पाकिस्तान की तरफ से बडगाम में घुसपैठ की ख़ुफ़िया सूचना मिली थी, जिस का जायजा लेने वे बडगाम गए थेI सूचना के मुताबिक लगभग एक हज़ार पाकिस्तानी लश्कर कश्मीरियों का भेस बदल कर श्रीनगर हवाई अड्डे की ओर बढ़ने को तैयार थे, उनका मकसद हवाई क्षेत्र पर कब्ज़ा कर भारतीय सेना को अपंग करना थाI बडगाम की ओर भेजी गयी तीनों टुकडियों का काम घुसपैठियों को ढूँढना व उन्हें बडगाम में ही उलझाए रखना थाI

 

सुबह जल्दी ही, मेजर सोमनाथ की टुकड़ी ने गांव के पश्चिम में एक पहाड़ी को खोद कर बंकर बना लिया थाI दूसरी ओर 1 पैरा ने गांव के दक्षिण-पूर्व में स्थान लियाI तीनों ही टुकडियों के मुताबिक गांव बिलकुल शांत थाI लोग किसी सामान्य दिन की तरह अपने रोज़मर्रा के कामों में लगे हुए थे, लेकिन वे थोड़े डरे हुए लग रहे थेI उन्होंने कुछ गांव वालों  को एक नाले के पास एकत्रित देखा, ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने वहां शरण ले रखी होI चूँकि गांव बिलकुल शांत लग रहा था, इसलिए 1 पैरा को पूर्व का एक चक्कर काट कर 1 पंजाब की टुकड़ी के साथ वापस श्रीनगर जाने का आदेश मिलाI दोनों टुकड़ियाँ आदेश मान कर दोपहर 1 बजे श्रीनगर पहुँच गयीI मेजर सोमनाथ को भी अपनी टुकड़ी के साथ वापस आ जाने का आदेश मिला, मगर उन्होंने शाम तक रुक कर वास्तविक स्थिति का जायज़ा लेने की गुज़ारिश कीI

 

इसी दौरान, सरहद के उस पार से आए लश्कर सबकी नज़रों से बचने के लिए छोटे-छोटे समूहों में एकत्रित होने लगेI उनका नेतृत्व एक पाकिस्तानी मेजर कर रहा था I उनकी योजना निरीक्षण के लिए आयी भारतीय सेना की टुकडियों को चकमा देने की थीI जैसे ही 2 बजे; अल्फा कंपनी श्रीनगर के लिए रवाना हुई, और 700 कबीलाई एक साथ एकत्रित हुए, पाकिस्तानी मेजर ने और इंतज़ार ना करते हुए हमला कर दियाI गाँव की तरफ से गोलियाँ चलती देख मेजर सोमनाथ आश्चर्यचकित हो गएI उन्होंने तुरंत ब्रिगेड को हमले की सूचना दी और कहा कि उनकी तरफ से किया गया जवाबी हमला गाँव में रह रहे बच्चों और महिलाओं के लिए जानलेवा हो सकता हैI

 

कुछ ही देर बाद पहाड़ी की तरफ से और हमलावर आ गएI दुश्मन का सैन्य बल हमसे बहुत ज्यादा था, हम 7 से 1 के अनुपात में कम थेI जल्द ही 700 लश्करों ने डेल्टा कंपनी को 3 तरफ से घेर लिया और पहाड़ी पर चढ़ कर बंकरों की ओर बढ़ने लगेI मेजर शर्मा को पता था कि उनके पास सैनिक बहुत कम हैं, उन्होंने ब्रिगेड से हथियार और सैनिकों की मांग कीI उनका उद्देश्य जब तक मदद न आ जाए तब तक दुश्मन को वहीं रोके रखना थाI उन्हें अच्छी तरह पता था की अगर वो यह नहीं कर पाए तो दुश्मन के लिए श्रीनगर पहुँचना और हवाई अड्डे पर कब्ज़ा करना बहुत आसान हो जाएगाI उन्होंने अपने 90 जवानों की ओर देखा, जो अपनी पूरी ताकत से दुश्मन को रोक रहे थे, वे सर पर कफ़न बांध कर लड़ रहे थे, मेजर शर्मा को यह यकीन हो गया था की अब सिर्फ एक चीज़ ही उन्हें जिता सकती है और वो है जवानों की इच्छा शक्तिI और इसीलिए, मेजर शर्मा रणभूमि में अपनी जान दाँव पर लगा कर जवानों का उत्साह बढ़ाने के लिए एक बंकर से दुसरे बंकर की ओर भाग रहे थेI चारों ओर से गोलियों की आवाज़े आ रही थीं, मगर इस शोर के बीच एक बुलंद आवाज़ सैनिकों को मार्गदर्शित करते हुए “इधर मारो, उधर मारो” कह रही थी, वो आवाज़ थी मेजर शर्मा कीI इसी तरह युद्ध पाँच घंटे और चलाI दुश्मनों को रोके रखने से भारतीय वायु सेना को रणभूमि में अतिरिक्त सेना पहुँचाने का समय मिल गयाI मेजर शर्मा अपने सैनिकों को मरते हुए देख रहे थे, मगर कोई रुकने को तैयार नहीं था, कोई मात्र भूमि की आबरू को दागदार करने को राज़ी नहीं थाI जिस तरह मुट्ठी भर भारतीय सैनिक दुश्मन को बराबरी की टक्कर दे रहे थे, यह क्षण न सिर्फ मेजर शर्मा के लिए बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए गर्व का थाI

 

जो सैनिक बडगाम हमले में बच गए उन्होंने बाद में बताया की मेजर शर्मा भारी गोलीबारी के बीच एक चौकी से दूसरी चौकी तक सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए भागते रहेI यह मेजर शर्मा के जोश और हिम्मत का ही कमाल था जिसने लश्कर के शुरुआती हमले को असफल कर दियाI

 

वीर से परमवीर

अंत में मेजर सोमनाथ की टुकड़ी की गोलियाँ ख़त्म होने लगेI जब उन्होंने ब्रिगेड को यह बात बताई तो उन्हें पीछे हट जाने का आदेश मिला, लेकिन हमारे वीर तो आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक लड़ने का फैसला कर चुके थेI अब वे कहाँ रुकने वाले थेI इसी तरह एक से दूसरी चौकी पर पहुँच कर मेजर शर्मा एक सिपाही की बंदूक में गोलियाँ भर रहे थे और तभी एक मोर्टार बम उस चौकी में रखे बारूद पर गिर गयाI एक बड़ा धमाका हुआ और उस जानलेवा धमाके में मेजर शर्मा के साथ उनके सहायक और एक कनिष्ठ ऑफ़िसर ने अपनी जान गँवा दीI

 

5 नवंबर की सुबह भारतीय सेना ने पूरे दल बल के साथ बडगाम पहुँच कर दुश्मनों को धूल चटा दीI मगर 4 कुमाओं ने अपने कई बहादुरों को खो दिया, मेजर शर्मा के साथ 21 वीर सैनिक शहीद हो गएI इस युद्ध में अद्भुत वीरता और अदम्य साहस के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गयाI मेजर सोमनाथ शर्मा ने जिस अदभुत नेतृत्व के दम पर दुश्मन के हाथ से कश्मीर को बचाया वह अतुलनीय हैI उन्हें आज़ाद भारत का पहला परमवीर चक्र दिया गयाI

 

हालाँकि हमने अपने कई बहादुरों को खो दिया, मगर जिस तरह मेजर सोमनाथ शर्मा ने स्थिति को संभाला, दुश्मन के लिए हार को स्वीकार करना बहुत मुश्किल हो गयाI मुट्ठी भर सैनिकों के साथ एक फ़ौज को टक्कर देकर मेजर सोमनाथ ने भारतीय युद्ध कौशल का बड़ा ही मजबूत उदाहरण दुनिया के सामने रखाI मेजर सोमनाथ की देशभक्ति, मात्रभूमि के लिए कुछ भी कर गुजरने की इच्छा, देश के लिए खुद को न्योछावर करने का साहस व देश के लिए एक-एक दुश्मन को मार गिराने का दम इस देश के हर नागरिक के लिए प्रेरणादायक हैI

 

हम मेजर सोमनाथ शर्मा को सलाम करते हैंI वे भले ही आज हमारे बीच न हो मगर उनकी शौर्य गाथा भारत की हर नौजवान पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगीI हर भारतीय अपने आप में मेजर सोमनाथ शर्मा की छवि ढूँढेगाI

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